Monday, September 14, 2026

"भाषा वह हिंदी हमारी"


संवाद सब जिससे मिले


गोद में जिसके पले 

संवाद सब जिससे मिले

वाहन बनी जो समझ का

वह मातृभाषा है हमारी

मां के जैसी ही है प्यारी

भाषा वह हिंदी हमारी।


जिसमें तुतलाएं, करी जिद

रोयें जिसमें, हँसे, खेले

बालपन के सब झमेले

लाख भाषाएँ जगत में

मेरे मन को लगे न्यारी

भाषा वह हिंदी हमारी।


ज्ञान का, विज्ञान का वह

सूचना संसार का वह

प्रथम अंकन जो है करती

जो हमें पूरा समझती

कभी, न चूकी, न हारी

भाषा वह हिंदी हमारी।


नहीं है वह शर्म, वह सम्मान है

भूलें नहीं उसको, वही अभिमान है

चपल है वह, है समर्थ

बोझ उसका नहीं भारी 

मां के जैसी ही है प्यारी

भाषा वह हिंदी हमारी।


आज ऊँची मंजिलों पर खड़े होकर

जिसके सहारे सीखकर, अब बड़े होकर

वह प्रथम सोपान शिक्षा का, सफलता का

संस्कृति और संस्कृत की वह दुलारी

आज भी जीवंत, है न थकी, हारी

भाषा वह हिंदी हमारी।


~ रश्मि मीमांसा 


Wednesday, September 2, 2026

ये मन जो है न

ये मन जो है न!



 

जीवन का कोई
स्वाद तो नहीं होता
फिर भी
लगता है मीठा
या खारा या खट्टा
या नमकीन,
जीवन की जीभ पर व्यापित
असंख्य
इच्छाओं के कारण।

ये मन जो है न
चखता है इन्हें
पर न तृप्त होता है,
न मुक्त होता है
और न ही कर पाता है
इच्छाओं का निवारण,
इन अबाधित असंख्य
इच्छाओं के कारण।


~ रश्मि मीमांसा