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| ये मन जो है न! |
जीवन का कोई
स्वाद तो नहीं होता
फिर भी
लगता है मीठा
या खारा या खट्टा
या नमकीन,
जीवन की जीभ पर व्यापित
असंख्य
इच्छाओं के कारण।
ये मन जो है न
चखता है इन्हें
पर न तृप्त होता है,
न मुक्त होता है
और न ही कर पाता है
इच्छाओं का निवारण,
इन अबाधित असंख्य
इच्छाओं के कारण।
~ रश्मि मीमांसा






