Showing posts with label कविता. Show all posts
Showing posts with label कविता. Show all posts

Wednesday, September 2, 2026

ये मन जो है न

ये मन जो है न!



 

जीवन का कोई
स्वाद तो नहीं होता
फिर भी
लगता है मीठा
या खारा या खट्टा
या नमकीन,
जीवन की जीभ पर व्यापित
असंख्य
इच्छाओं के कारण।

ये मन जो है न
चखता है इन्हें
पर न तृप्त होता है,
न मुक्त होता है
और न ही कर पाता है
इच्छाओं का निवारण,
इन अबाधित असंख्य
इच्छाओं के कारण।


~ रश्मि मीमांसा

Monday, August 31, 2026

कैसा क्या कर्तापन

 

लहरों की तरह मन



                                                                        उठता है, बैठता है
                                                                        लहरों की तरह मन
                                                                        सागर है स्थिर पर
स्वयं का स्वामी बन।

कोई आघात नहीं
भंग कर पाता है
सागर के होने को
किन्तु
मन की ये लहरें तो
उठती ही हैं बस
सागर में खोने को।

कैसा फिर अहम हो
कैस किस पर नियंत्रण
कैसी फिर योजनाएं
कैसा क्या कर्तापन।


~ रश्मि मीमांसा 

Tuesday, August 25, 2026

आना तुम!

किन्तु पवित्र, मेरी प्रार्थना।




न परिष्कृत
न परिपूर्ण 
किन्तु पवित्र, मेरी प्रार्थना।

मैंने आत्मा की चौंध में
देखा तुम्हें है मुस्कुराते
पाया है स्वप्न में तुम्हें मैंने।

तुम अलभ्य
किन्तु अभीष्ट
इस रीते हृदय की राह आना तुम।

मन की आँखों में 
विरह के अश्रु और
तन की हथेली पर धरे हैं
प्रतीक्षा के पुष्प,
आना तुम!



रश्मि मीमांसा 


 

Thursday, August 20, 2026

अनुभव हो कि अभिनय

 



जानकर नहीं बन सकते न, अनजान!
ज्ञान  का पथ



जानकर नहीं बन सकते न,
अनजान!

सम्मोहन टूटता है
तो टूट जाता है बहुत कुछ। 

फिर ये जीवन
अनुभव हो कि अभिनय
इस तरह तो नहीं
चलते रह सकोगे। 

ज्ञान का पथ
मांगता है प्राण
दे सकोगे क्या?

कुछ भी
मिलेगा या नहीं,
ये जानकर!



रश्मि मीमांसा

Wednesday, August 19, 2026

खुदा की कलम में

 

रोशनाई है नीला आसमान



खुदा की कलम में
रोशनाई है नीला आसमान।


धरती के प्यार में
लिखे उसने नाचते निर्झर;
उमंग में बहतीं नदियाँ लिखीं
और लिखीं छोटी छोटी
उन्मुक्त जलधाराएँ,

उर्मियों में हुलसता समुंदर लिखा है उसने
जब भी लिखा एक जीवन लिखा है उसने।

~ रश्मि मीमांसा 

Monday, August 17, 2026

बीज जीवन का

 

बीज जीवन का



बीज जीवन का सुलाकर
हृदय में
मुस्कुराहट मार कर मन की
जिएंगे
तू अमरता का कलश देगा हमें
विष
अहम का घोलकर ही हम पियेंगे
चाह
के ही सर्प को रस्सी समझकर हम
चढ़ेगे
आत्मा का स्फुरण पगतल कुचलकर
तू
कहे कितना भी कि 
'तू सब छोड़ मेरी शरण आ।'

हम क्यों सुनेंगे!!


~ रश्मि मीमांसा

आदमी चलता रहा है

आदमी चलता रहा है



जिन्दगी की फुसफुसाहट
और धीमे चाह के स्वर,
नाज़ से पाले गए वे
स्वप्न सारे हृदय में भर,
आदमी चलता रहा है
पवन में पलता रहा है
धूल बनकर भी खिला है
फूल बनकर भी मिटा है
नीर की भी गोद में वह
अग्नि सा जल
आत्म के आकाश से
झरता रहा है।
आदमी चलता रहा है।


~ रश्मि मीमांसा