![]() |
| संवाद सब जिससे मिले |
गोद में जिसके पले
संवाद सब जिससे मिले
वाहन बनी जो समझ का
वह मातृभाषा है हमारी
मां के जैसी ही है प्यारी
भाषा वह हिंदी हमारी।
जिसमें तुतलाएं, करी जिद
रोयें जिसमें, हँसे, खेले
बालपन के सब झमेले
लाख भाषाएँ जगत में
मेरे मन को लगे न्यारी
भाषा वह हिंदी हमारी।
ज्ञान का, विज्ञान का वह
सूचना संसार का वह
प्रथम अंकन जो है करती
जो हमें पूरा समझती
कभी, न चूकी, न हारी
भाषा वह हिंदी हमारी।
नहीं है वह शर्म, वह सम्मान है
भूलें नहीं उसको, वही अभिमान है
चपल है वह, है समर्थ
बोझ उसका नहीं भारी
मां के जैसी ही है प्यारी
भाषा वह हिंदी हमारी।
आज ऊँची मंजिलों पर खड़े होकर
जिसके सहारे सीखकर, अब बड़े होकर
वह प्रथम सोपान शिक्षा का, सफलता का
संस्कृति और संस्कृत की वह दुलारी
आज भी जीवंत, है न थकी, हारी
भाषा वह हिंदी हमारी।
~ रश्मि मीमांसा

No comments:
Post a Comment