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| आदमी चलता रहा है |
जिन्दगी की फुसफुसाहट
और धीमे चाह के स्वर,
नाज़ से पाले गए वे
स्वप्न सारे हृदय में भर,
आदमी चलता रहा है
पवन में पलता रहा है
धूल बनकर भी खिला है
फूल बनकर भी मिटा है
नीर की भी गोद में वह
अग्नि सा जल
आत्म के आकाश से
झरता रहा है।
आदमी चलता रहा है।
~ रश्मि मीमांसा

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