![]() |
| किन्तु पवित्र, मेरी प्रार्थना। |
न परिष्कृत
न परिपूर्ण
किन्तु पवित्र, मेरी प्रार्थना।
मैंने आत्मा की चौंध में
देखा तुम्हें है मुस्कुराते
पाया है स्वप्न में तुम्हें मैंने।
तुम अलभ्य
किन्तु अभीष्ट
इस रीते हृदय की राह आना तुम।
मन की आँखों में
विरह के अश्रु और
तन की हथेली पर धरे हैं
प्रतीक्षा के पुष्प,
आना तुम!
रश्मि मीमांसा

No comments:
Post a Comment