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| लहरों की तरह मन |
लहरों की तरह मन
सागर है स्थिर पर
स्वयं का स्वामी बन।
कोई आघात नहीं
भंग कर पाता है
सागर के होने को
किन्तु
मन की ये लहरें तो
उठती ही हैं बस
सागर में खोने को।
कैसा फिर अहम हो
कैस किस पर नियंत्रण
कैसी फिर योजनाएं
कैसा क्या कर्तापन।
~ रश्मि मीमांसा

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