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| बीज जीवन का |
बीज जीवन का सुलाकर
हृदय में
मुस्कुराहट मार कर मन की
जिएंगे
तू अमरता का कलश देगा हमें
विष
अहम का घोलकर ही हम पियेंगे
चाह
के ही सर्प को रस्सी समझकर हम
चढ़ेगे
आत्मा का स्फुरण पगतल कुचलकर
तू
कहे कितना भी कि
'तू सब छोड़ मेरी शरण आ।'
हम क्यों सुनेंगे!!
~ रश्मि मीमांसा

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